Ek pita ek sanyasi

Creative Vision


 

एक पिता एक सन्यासी 

सन १९८४ में लम्बी बीमारी के चलते मेरी माँ का स्वर्गवास हो गया था | मेरे पिताजी के कन्धों पर 5 बच्चों की जिम्मेदारी थी उन्होंने काफी संघर्षों से हमें पाल पोस कर बड़ा किया पढ़ाया लिखाया काबिल बनाया अपनी हर ख़ुशी हमारे ऊपर न्योछावर कर दी |




माँ के स्वर्गवास के बाद हमें कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी कड़ी धुप में तपकर , ठण्ड में ठिठुर कर , बरसात में भीगकर अकेले खेती करते रहे , खुद एक सन्यासी जिन्दगी जिए हमें दुनियाँ की हर ख़ुशी दी राजाओं जैसी जिन्दगी दी थी हमें | में दुनियाँ का सबसे भाग्यशाली इन्शान था मैने पूर्व जन्म में अवश्य ही करोड़ों दान पुण्य किये होंगे जो इस जन्म में आप जैसा पिता और शिवराम जैसा बड़ा भाई मिला | अगर मुझे दोवारा मनुष्य जन्म मिलेगा तो हर जन्म में आपका ही बेटा बनूँ और हर जन्म में मझले भैया शिवराम का छोटा भाई बनूँ | तो ही मुझे दोवारा मनुष्य का जन्म मिले ऐसी ही कामना परमात्मा से करता हूँ |



आज आपका पहला सावन है सोचा नहीं था इतने जल्दी आप हमें छोड़कर चले जायेंगे , हर पल आपकी कमी खलती है सदैव महसूस होता है की आप अद्रस्य शक्ति के रूप में हमारे साथ हैं हर पल ऐसा महसूस होता है आप हमारे आस पास ही हैं | 



कोटि कोटि प्रणाम पिताजी